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mahabharat 3.33.26: 'इसी प्रकार जो पुरुष निरन्तर केवल काम की इच्छा करता है और धर्म और अर्थ का पालन नहीं करता, उसके मित्र नष्ट हो जाते हैं (उसे त्यागकर चले जाते हैं) और वह धर्म और अर्थ दोनों से वंचित रह जाता है॥ 26॥   |   mahabharat अध्याय 3.33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  3.33.26 
सततं यश्च कामार्थी नेतरावनुतिष्ठति।
मित्राणि तस्य नश्यन्ति धर्मार्थाभ्यां च हीयते॥ २६॥
 
 
अनुवाद
'इसी प्रकार जो पुरुष निरन्तर केवल काम की इच्छा करता है और धर्म और अर्थ का पालन नहीं करता, उसके मित्र नष्ट हो जाते हैं (उसे त्यागकर चले जाते हैं) और वह धर्म और अर्थ दोनों से वंचित रह जाता है॥ 26॥
 
'Similarly, a person who constantly desires only lust and does not pursue Dharma and Artha, his friends get destroyed (abandon him and go away) and he remains deprived of both Dharma and Artha.॥ 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)