श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  3.33.24 
यस्य चार्थार्थमेवार्थ: स च नार्थस्य कोविद:।
रक्षेत भृतकोऽरण्ये यथा गास्तादृगेव स:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
जिसका धन केवल धन के लिए ही है, दान आदि के लिए नहीं, वह धन के तत्व को नहीं जानता। जैसे सेवक (ग्वालर) वन में गायों की रक्षा करता है, वैसे ही वह भी किसी अन्य के लिए उस धन का रक्षक मात्र है॥ 24॥
 
‘One whose wealth is only for wealth and not for charity etc., does not know the essence of wealth. Just like a servant (cowherd) protects the cows in the forest, in the same way he too is only a protector of that wealth for someone else.॥ 24॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas