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mahabharat 3.33.1: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! द्रुपदपुत्री के वचन सुनकर भीमसेन क्रोध में भरकर राजा के पास आए और क्रोधपूर्वक आह भरते हुए इस प्रकार बोले -॥1॥   |   mahabharat अध्याय 3.33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.33.1 
वैशम्पायन उवाच
याज्ञसेन्या वच: श्रुत्वा भीमसेनो ह्यमर्षण:।
नि:श्वसन्नुपसंगम्य क्रुद्धो राजानमब्रवीत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! द्रुपदपुत्री के वचन सुनकर भीमसेन क्रोध में भरकर राजा के पास आए और क्रोधपूर्वक आह भरते हुए इस प्रकार बोले -॥1॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! On hearing the words of Drupada's daughter, Bhimasena, filled with resentment, came to the King sighing angrily and said thus:॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)