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श्लोक 3.32.62  |
स मां राजन् कर्मवतीमागतामाह सान्त्वयन्।
शुश्रूषमाणामासीनां पितुरङ्के युधिष्ठिर॥ ६२॥ |
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| अनुवाद |
| महाराज युधिष्ठिर! उस समय मैं किसी कार्य से अपने पिता के पास आया था और यह सब सुनने की इच्छा से उनकी गोद में बैठ गया था। तब उन ब्राह्मण भगवान ने मुझे सान्त्वना दी और यह नीति उपदेश की। 62. |
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| Maharaj Yudhishthira! At that time I had come to my father for some work and sat on his lap with the desire to hear all this. Then that Brahmin God consoled me and preached this policy. 62. |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्रौपदीवाक्ये द्वात्रिंशोऽध्याय:॥ ३२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें द्रौपदीवाक्यविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२॥
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