श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  3.32.57 
उत्थानयुक्त: सततं परेषामन्तरैषणे।
आनृण्यमाप्नोति नर: परस्यात्मन एव च॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को सदैव अपने शत्रुओं की दुर्बलता जानने का प्रयत्न करना चाहिए। ऐसा करने से वह अपनी दृष्टि में तथा दूसरों की दृष्टि में भी निर्दोष हो जाता है ॥57॥
 
One should always strive to find out the weaknesses of his enemies. By doing so, he becomes blameless in his own eyes as well as in the eyes of others. ॥ 57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)