श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  3.32.56 
व्यसनं वास्य काङ्क्षेत विवासं वा युधिष्ठिर।
अपि सिन्धोर्गिरेर्वापि किं पुनर्मर्त्यधर्मिण:॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
महाराज युधिष्ठिर! या शत्रु पर कोई बड़ी विपत्ति आने की या उसके देश से निकाले जाने की प्रतीक्षा करो; क्योंकि यदि तुम्हारा शत्रु समुद्र या पर्वत है, तो उस पर भी विपत्ति लाने की इच्छा करो; फिर मरणधर्मा मनुष्य के विषय में क्या कहा जा सकता है?॥ 56॥
 
Maharaj Yudhishthira! Or wait for some great calamity to befall the enemy or for him to be expelled from the country; because if your enemy is the ocean or mountain, then you should wish to bring calamity upon it as well; then what can one say about a mortal man?॥ 56॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas