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mahabharat 3.32.53: धैर्यवान पुरुष को शुभ कल्याण की वृद्धि के लिए अपनी बुद्धि से अपने बल और शक्ति का विचार करना चाहिए तथा देश और काल के अनुसार ही रिश्वत आदि साधनों का प्रयोग करना चाहिए ॥53॥   |   mahabharat अध्याय 3.32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  3.32.53 
देशकालावुपायांश्च मङ्गलं स्वस्तिवृद्धये।
युनक्ति मेधया धीरो यथाशक्ति यथाबलम्॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
धैर्यवान पुरुष को शुभ कल्याण की वृद्धि के लिए अपनी बुद्धि से अपने बल और शक्ति का विचार करना चाहिए तथा देश और काल के अनुसार ही रिश्वत आदि साधनों का प्रयोग करना चाहिए ॥53॥
 
A patient man, for the sake of increasing auspicious welfare, should use his intellect to consider his strength and power and should use the means of bribery, etc. according to the place and time. ॥ 53॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)