श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  3.32.52 
गुणाभावे फलं न्यूनं भवत्यफलमेव च।
अनारम्भे हि न फलं न गुणो दृश्यते क्वचित्॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
यदि कर्म का कोई अंश लुप्त हो, तो उसका फल अल्प हो सकता है। यह भी संभव है कि फल मिले ही न। किन्तु यदि कर्म आरम्भ ही न किया जाए, तो उसका फल कहीं दिखाई नहीं देगा और न कर्ता का कोई गुण (पराक्रम आदि) ही दिखाई देगा ॥52॥
 
If any part of the deeds is missing, then there may be little result. It is also possible that there may be no result. But if the deed is not started then the result will not be seen anywhere and neither will any quality (valour etc.) of the doer be visible. ॥ 52॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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