श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  3.32.51 
सिद्धिर्वाप्यथवासिद्धिरप्रवृत्तिरतोऽन्यथा।
बहूनां समवाये हि भावानां कर्म सिद्धॺति॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
महाराज! मन में यह संदेह रखकर कि कार्य सफल होगा या नहीं, कार्य में न लगना उचित नहीं है; क्योंकि कार्य में सफलता तभी मिलती है जब अनेक कारक एक साथ आ जाते हैं ॥ 51॥
 
Maharaj! It is not right to not engage in work with a doubt in your mind as to whether the work will be successful or not; because success in work is achieved only when many factors come together. ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)