| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना » श्लोक 47-49 |
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| | | | श्लोक 3.32.47-49  | पृथिवीं लाङ्गलेनेह भित्त्वा बीजं वपत्युत।
आस्तेऽथ कर्षकस्तूष्णीं पर्जन्यस्तत्र कारणम्॥ ४७॥
वृष्टिश्चेन्नानुगृह्णीयादनेनास्तत्र कर्षक:।
यदन्य: पुरुष: कुर्यात् तत् कृतं सफलं मया॥ ४८॥
तच्चेदं फलमस्माकमपराधो न मे क्वचित्।
इति धीरोऽन्ववेक्ष्यैव नात्मानं तत्र गर्हयेत्॥ ४९॥ | | | | | | अनुवाद | | किसान धरती जोतकर उसमें बीज बोता है और फिर चुपचाप बैठ जाता है; क्योंकि बादल ही उसे सफल बनाने का कारण हैं। यदि वर्षा नहीं होती, तो किसान का कोई दोष नहीं है। किसान मन में सोचता है कि जो भी सफल जुताई-बुआई का कार्य अन्य लोगों द्वारा किया जाता है, वही मैंने भी किया है। ऐसे में यदि मुझे ऐसा प्रतिकूल परिणाम मिलता है, तो इसमें मेरा कोई दोष नहीं है - ऐसा सोचकर बुद्धिमान किसान उस असफलता के लिए स्वयं को दोषी नहीं ठहराता। | | | | The farmer ploughs the earth and sows seeds in it and then sits quietly; because the clouds are the reason for making it successful. If the rain does not shower, then the farmer is not at fault. The farmer thinks in his mind that whatever successful work of ploughing and sowing is done by other people, I have also done the same. In that case, if I get such an unfavorable result, then it is not my fault - thinking like this, the wise farmer does not blame himself for that failure. | | ✨ ai-generated | | |
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