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श्लोक 3.32.44  |
एकान्तेन ह्यनर्थोऽयं वर्ततेऽस्मासु साम्प्रतम्।
स तु नि:संशयं न स्यात् त्वयि कर्मण्यवस्थिते॥ ४४॥ |
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| अनुवाद |
| इस समय हमारे राज्य के हड़पने के रूप में एक महान विपत्ति हम पर आ पड़ी है। यदि तुम यत्नपूर्वक कर्म में लग जाओ, तो निश्चय ही यह विपत्ति टल सकती है ॥ 44॥ |
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| At this time a great calamity in the form of usurpation of our kingdom has befallen us. If you engage yourself diligently in action, then certainly this calamity can be averted. ॥ 44॥ |
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