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mahabharat 3.32.41: यदि कर्तव्य करने के बाद भी उसका फल प्राप्त न हो, तो कोई न कोई कारण अवश्य है; ऐसा मानकर प्रायश्चित (दोष निवारण) पर विचार करना चाहिए। राजेन्द्र! कर्तव्य का पूर्णतः पालन करने पर कर्ता ऋण से मुक्त (निर्दोष) हो जाता है। ॥41॥   |   mahabharat अध्याय 3.32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  3.32.41 
असम्भवे त्वस्य हेतु: प्रायश्चित्तं तु लक्षयेत्।
कृते कर्मणि राजेन्द्र तथानृण्यमवाप्नुते॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
यदि कर्तव्य करने के बाद भी उसका फल प्राप्त न हो, तो कोई न कोई कारण अवश्य है; ऐसा मानकर प्रायश्चित (दोष निवारण) पर विचार करना चाहिए। राजेन्द्र! कर्तव्य का पूर्णतः पालन करने पर कर्ता ऋण से मुक्त (निर्दोष) हो जाता है। ॥41॥
 
If after performing a duty, the result is not achieved, then there is some reason; assuming this, one should look at the atonement (solution for the fault). Rajendra! After performing the duty completely, the doer becomes free from debt (innocent). ॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)