श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.32.31 
कर्तृत्वादेव पुरुष: कर्मसिद्धौ प्रशस्यते।
असिद्धौ निन्द्यते चापि कर्मनाशात् कथं त्विह॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
कर्ता होने के कारण ही कार्यसिद्धि होने पर मनुष्य की प्रशंसा होती है और कार्यसिद्धि न होने पर उसकी निन्दा होती है। यदि कर्म सर्वथा नष्ट हो जाए, तो यहाँ कार्यसिद्धि कैसे हो सकती है? ॥31॥
 
Because of being the doer, a person is praised for achieving a task and when the task is not accomplished, he is criticized. If the karma is completely destroyed, then how can the task be accomplished here? ॥ 31॥
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