श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.32.23 
कारणं तस्य देहोऽयं धातु: कर्मणि वर्तते।
स यथा प्रेरयत्येनं तथायं कुरुतेऽवश:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
कर्म में तत्पर यह मानव शरीर भगवान् के कर्मफल प्राप्ति का साधन है। वे इसे जो प्रेरणा देते हैं, यह उसी को करने के लिए (स्वेच्छा से प्रारब्ध भोग के लिए) विवश हो जाता है।॥ 23॥
 
This human body which is engaged in action is the means of God's work of achieving the results of action. Whatever inspiration He gives it, it is compelled to do the same (willingly for the enjoyment of destiny).॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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