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mahabharat 3.32.2: भरत! तुम समझ लो कि मैं दुःख से विलाप कर रही हूँ। मैं रुकूँगी नहीं, और भी अधिक रोऊँगी। कृपया प्रसन्न मन से मेरी बात सुनो॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 3.32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 32: द्रौपदीका पुरुषार्थको प्रधान मानकर पुरुषार्थ करनेके लिये जोर देना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.32.2 
आर्ताहं प्रलपामीदमिति मां विद्धि भारत।
भूयश्च विलपिष्यामि सुमनास्त्वं निबोध मे॥ २॥
 
 
अनुवाद
भरत! तुम समझ लो कि मैं दुःख से विलाप कर रही हूँ। मैं रुकूँगी नहीं, और भी अधिक रोऊँगी। कृपया प्रसन्न मन से मेरी बात सुनो॥ 2॥
 
Bharata! You should understand that I am wailing in grief. I will not stop and will cry even more. Please listen to me with a happy heart.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)