श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 315: अज्ञातवासके लिये अनुमति लेते समय शोकाकुल हुए युधिष्ठिरको महर्षि धौम्यका समझाना, भीमसेनका उत्साह देना तथा आश्रमसे दूर जाकर पाण्डवोंका परस्पर परामर्शके लिये बैठना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.315.5 
उषिताश्च वने कृच्छ्रे वयं द्वादश वत्सरान्।
अज्ञातवाससमयं शेषं वर्षं त्रयोदशम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हम बारह वर्षों तक कष्टमय वन में रहे हैं, अब अन्तिम तेरहवाँ वर्ष हमारे वनवास का समय है॥5॥
 
We have lived in the painful forest for twelve years. Now the last thirteenth year is the time of our exile.॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)