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श्लोक 3.315.30-31  |
क्रोशमात्रमुपागम्य तस्माद् देशान्निमित्तत:।
श्वोभूते मनुजव्याघ्राश्छन्नवासार्थमुद्यता:॥ ३०॥
पृथक्छास्त्रविद: सर्वे सर्वे मन्त्रविशारदा:।
संधिविग्रहकालज्ञा मन्त्राय समुपाविशन्॥ ३१॥ |
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| अनुवाद |
| किसी कारणवश वे उस स्थान से एक मील दूर जाकर नरश्रेष्ठ नामक स्थान पर रुके और वहाँ बैठकर परस्पर परामर्श करने लगे, तथा अगले दिन से वनवास आरम्भ करने की तैयारी करने लगे। वे सभी लोग भिन्न-भिन्न शास्त्रों के ज्ञाता, परामर्श देने में कुशल तथा संधि-विग्रह आदि के अवसरों को जानने वाले थे। 30-31॥ |
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| For some reason, after going a mile away from that place, they stopped at Narashreshtha and sat around to consult each other, getting ready to start their exile from the next day. All of them were knowledgeable about different scriptures, skilled in giving advice and knew the opportunities of Sandhi-Vigraha etc. 30-31॥ |
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इति श्रीमहाभारते शतसाहस्रॺां संहितायां वैयासिक्यां वनपर्वणि आरणेयपर्वणि अज्ञातवासमन्त्रणे पञ्चदशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३१५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत—व्यासनिर्मित शतसाहस्री संहिताके वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें अज्ञातवासके लिये मन्त्रणाविषयक तीन सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१५॥
वनपर्वकी श्लोक-संख्या |
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