श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 315: अज्ञातवासके लिये अनुमति लेते समय शोकाकुल हुए युधिष्ठिरको महर्षि धौम्यका समझाना, भीमसेनका उत्साह देना तथा आश्रमसे दूर जाकर पाण्डवोंका परस्पर परामर्शके लिये बैठना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.315.21 
एवमेव महात्मान: प्रच्छन्नास्तत्र तत्र ह।
अजयञ्छात्रवान् युद्धे तथा त्वमपि जेष्यसि॥ २१॥
 
 
अनुवाद
‘जिस प्रकार अनेक महापराक्रमी पुरुषों ने युद्ध में इधर-उधर छिपकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त की है, उसी प्रकार तुम भी विजयी होगे।’॥21॥
 
‘Similarly, many great and brave men have conquered their enemies in war by hiding here and there. In the same way, you too will be victorious.’॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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