श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 315: अज्ञातवासके लिये अनुमति लेते समय शोकाकुल हुए युधिष्ठिरको महर्षि धौम्यका समझाना, भीमसेनका उत्साह देना तथा आश्रमसे दूर जाकर पाण्डवोंका परस्पर परामर्शके लिये बैठना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.315.14 
विष्णुनाश्वशिर: प्राप्य तथादित्यां निवत्स्यता।
गर्भे वधार्थं दैत्यानामज्ञातेनोषितं चिरम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
भगवान विष्णु भी दैत्यों का संहार करने के लिए हयग्रीव रूप धारण करके अनजाने में ही बहुत समय तक अदिति के गर्भ में रहे॥14॥
 
Lord Vishnu also, in order to kill the demons, assumed the form of Hayagriva and remained in the womb of Aditi for a long time, unknowingly.॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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