vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 315: अज्ञातवासके लिये अनुमति लेते समय शोकाकुल हुए युधिष्ठिरको महर्षि धौम्यका समझाना, भीमसेनका उत्साह देना तथा आश्रमसे दूर जाकर पाण्डवोंका परस्पर परामर्शके लिये बैठना
»
श्लोक 12
श्लोक
3.315.12
देवैरप्यापद: प्राप्ताश्च्छन्नैश्च बहुशस्तथा।
तत्र तत्र सपत्नानां निग्रहार्थं महात्मभि:॥ १२॥
अनुवाद
‘महान् मनस्वी देवताओं को भी अपने शत्रुओं को दबाने के लिए प्रायः छिपकर रहना पड़ा है और कष्ट सहने पड़े हैं।॥12॥
‘Even the great-minded gods have often had to live in hiding and suffer hardships in order to subdue their enemies.॥ 12॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×