श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 315: अज्ञातवासके लिये अनुमति लेते समय शोकाकुल हुए युधिष्ठिरको महर्षि धौम्यका समझाना, भीमसेनका उत्साह देना तथा आश्रमसे दूर जाकर पाण्डवोंका परस्पर परामर्शके लिये बैठना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.315.12 
देवैरप्यापद: प्राप्ताश्च्छन्नैश्च बहुशस्तथा।
तत्र तत्र सपत्नानां निग्रहार्थं महात्मभि:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
‘महान् मनस्वी देवताओं को भी अपने शत्रुओं को दबाने के लिए प्रायः छिपकर रहना पड़ा है और कष्ट सहने पड़े हैं।॥12॥
 
‘Even the great-minded gods have often had to live in hiding and suffer hardships in order to subdue their enemies.॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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