| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 314: यक्षका चारों भाइयोंको जिलाकर धर्मके रूपमें प्रकट हो युधिष्ठिरको वरदान देना » श्लोक 9 |
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| | | | श्लोक 3.314.9  | दिष्टॺा पञ्चसु रक्तोऽसि दिष्टॺा ते षट्पदी जिता।
द्वे पूर्वे मध्यमे द्वे च द्वे चान्ते साम्परायिके॥ ९॥ | | | | | | अनुवाद | | सौभाग्य से तुम्हें इन पाँच साधनों से प्रेम है - शांति, संयम, वैराग्य, धैर्य और संतोष। सौभाग्य से तुमने भूख-प्यास, शोक-मोह, बुढ़ापा-मृत्यु - इन छह दोषों पर विजय प्राप्त कर ली है। इनमें से पहले दो दोष तो आरम्भ से ही विद्यमान रहते हैं, बीच के दो दोष युवावस्था में आते हैं और अंतिम दो दोष अन्त में आते हैं।॥9॥ | | | | Fortunately you have love for these five means- calmness, self-control, detachment, patience and satisfaction. Fortunately you have conquered the six defects- hunger-thirst, sorrow-attachment, old age-death. Out of these, the first two defects are present from the beginning, the middle two are there when youth comes and the last two defects come at the end.॥9॥ | | ✨ ai-generated | | |
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