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श्लोक 3.314.29  |
न चाप्यधर्मे न सुहृद्विभेदने
परस्वहारे परदारमर्शने।
कदर्यभावे न रमेन्मन: सदा
नृणां सदाख्यानमिदं विजानताम्॥ २९॥ |
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| अनुवाद |
| और जो लोग इस सुन्दर कथा को सदैव स्मरण रखेंगे, उनका मन पाप, मित्रों में फूट डालना, दूसरों का धन चुराना, व्यभिचार या कंजूसी की ओर कभी प्रवृत्त नहीं होगा ॥29॥ |
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| And those who will always remember this beautiful anecdote; their mind will never be inclined towards sin, creating divisions among friends, stealing the wealth of others, adultery or miserliness. ॥ 29॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आरणेयपर्वणि नकुलादिजीवनादिवरप्राप्तौ चतुर्दशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३१४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें नकुल आदिके जीवित होने आदि वरोंकी प्राप्तिविषयक
तीन सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१४॥ |
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