श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 314: यक्षका चारों भाइयोंको जिलाकर धर्मके रूपमें प्रकट हो युधिष्ठिरको वरदान देना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.314.12 
युधिष्ठिर उवाच
अरणीसहितं यस्य मृगो ह्यादाय गच्छति।
तस्याग्नयो न लुप्येरन् प्रथमोऽस्तु वरो मम॥ १२॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, 'हे प्रभु! मैं पहला वर यह माँगता हूँ कि जिस ब्राह्मण की मथानी की लकड़ी अरणी सहित मृग ले गया है, उसका अग्निहोत्र नष्ट न हो।
 
Yudhishthira said, 'O Lord! The first boon I ask for is that the Agnihotra of the Brahmin whose churning wood along with the Arani has been taken away by the deer should not be lost.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)