श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 96
 
 
श्लोक  3.313.96 
युधिष्ठिर उवाच
स्वधर्मे स्थिरता स्थैर्यं धैर्यमिन्द्रियनिग्रह:।
स्नानं मनोमलत्यागो दानं वै भूतरक्षणम्॥ ९६॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने कहा, "स्वधर्म में दृढ़ रहना स्थिरता है, इन्द्रियों को वश में रखना धैर्य है, मानसिक अशुद्धियों से छुटकारा पाना परम स्नान है और प्राणियों की रक्षा करना दान है।"
 
Yudhishthira said, "Standing firm in one's own religion is stability, controlling the senses is patience, getting rid of mental impurities is the ultimate bath and protecting creatures is charity."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas