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श्लोक 3.313.95  |
यक्ष उवाच
किं स्थैर्यमृषिभि: प्रोक्तं किं च धैर्यमुदाहृतम्।
स्नानं च किं परं प्रोक्तं दानं च किमिहोच्यते॥ ९५॥ |
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| अनुवाद |
| यक्ष ने पूछा - ऋषिगण स्थिरता किसे कहते हैं ? धैर्य किसे कहते हैं ? परम स्नान किसे कहते हैं ? और दान किसे कहते हैं ?॥95॥ |
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| Yaksha asked - What do the sages call stability? What is called patience? What is called the ultimate bath? And what is called charity?॥95॥ |
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