श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 94
 
 
श्लोक  3.313.94 
युधिष्ठिर उवाच
मोहो हि धर्ममूढत्वं मानस्त्वात्माभिमानिता।
धर्मनिष्क्रियताऽऽलस्यं शोकस्त्वज्ञानमुच्यते॥ ९४॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने कहा, 'धर्म में मूढ़ता मोह है, आत्म-अभिमान अभिमान है, धर्म का पालन न करना आलस्य है और अज्ञानता को दुःख कहा गया है।'
 
Yudhishthira said, 'Idiocy in religion is delusion, self-respect is pride, not following the religion is laziness and ignorance is called sorrow.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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