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श्लोक 3.313.93  |
यक्ष उवाच
को मोह: प्रोच्यते राजन् कश्च मान: प्रकीर्तित:।
किमालस्यं च विज्ञेयं कश्च शोक: प्रकीर्तित:॥ ९३॥ |
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| अनुवाद |
| यक्ष ने पूछा - हे राजन! आसक्ति किसे कहते हैं? अभिमान किसे कहते हैं? आलस्य किसे जानना चाहिए? और शोक किसे कहते हैं?॥93॥ |
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| The Yaksha asked - O King! What is called attachment? What is called pride? What should be known as laziness? And what is called grief?॥93॥ |
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