श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 92
 
 
श्लोक  3.313.92 
युधिष्ठिर उवाच
क्रोध: सुदुर्जय: शत्रुर्लोभो व्याधिरनन्तक:।
सर्वभूतहित: साधुरसाधुर्निर्दय: स्मृत:॥ ९२॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले - क्रोध अजेय शत्रु है, लोभ अनंत रोग है, जो सब प्राणियों का उपकार करता है, वह साधु है और क्रूर पुरुष तपस्वी माना जाता है ॥ 92॥
 
Yudhishthira said - Anger is an invincible enemy, greed is an endless disease, he who does good to all creatures is a saint and a cruel man is considered as an ascetic.॥ 92॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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