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mahabharat 3.313.88: युधिष्ठिर ने कहा - स्वधर्म में तत्पर रहना तप है, मन को वश में रखना आत्मसंयम कहलाता है, सर्दी-गर्मी के कष्टों को सहन करना क्षमा है और अवांछनीय कार्यों से दूर रहना लज्जा है।   |   mahabharat अध्याय 3.313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  3.313.88 
युधिष्ठिर उवाच
तप: स्वधर्मवर्तित्वं मनसो दमनं दम:।
क्षमा द्वन्द्वसहिष्णुत्वं ह्रीरकार्यनिवर्तनम्॥ ८८॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने कहा - स्वधर्म में तत्पर रहना तप है, मन को वश में रखना आत्मसंयम कहलाता है, सर्दी-गर्मी के कष्टों को सहन करना क्षमा है और अवांछनीय कार्यों से दूर रहना लज्जा है।
 
Yudhishthira said - To be devoted to one's own religion is austerity, to control the mind is called self-control, tolerating the problems of heat and cold is forgiveness and to stay away from undesirable work is shame.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)