श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  3.313.84 
युधिष्ठिर उवाच
मृतो दरिद्र: पुरुषो मृतं राष्ट्रमराजकम्।
मृतमश्रोत्रियं श्राद्धं मृतो यज्ञस्त्वदक्षिण:॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, 'दरिद्र मनुष्य मरा हुआ है, अर्थात् मृतक के समान है। राजा के बिना राज्य मर जाता है, अर्थात् नष्ट हो जाता है। श्रोत्रिय ब्राह्मण के बिना श्राद्ध कर्म मृत है और दक्षिणा के बिना यज्ञ निष्फल है।'
 
Yudhishthira said, 'A poor man is dead, that is, he is like a dead man. Without a king, a kingdom dies, that is, it is destroyed. Without a Shrotri Brahmin, a Shraadha ritual is dead, and without Dakshina, a Yagna is destroyed.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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