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mahabharat 3.313.78: युधिष्ठिर ने कहा: अभिमान त्यागने से मनुष्य दूसरों का प्रिय हो जाता है, क्रोध त्यागने से वह शोक नहीं करता, काम त्यागने से वह धनवान हो जाता है और लोभ त्यागने से वह सुखी हो जाता है।   |   mahabharat अध्याय 3.313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  3.313.78 
युधिष्ठिर उवाच
मानं हित्वा प्रियो भवति क्रोधं हित्वा न शोचति।
कामं हित्वार्थवान् भवति लोभं हित्वा सुखी भवेत्॥ ७८॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने कहा: अभिमान त्यागने से मनुष्य दूसरों का प्रिय हो जाता है, क्रोध त्यागने से वह शोक नहीं करता, काम त्यागने से वह धनवान हो जाता है और लोभ त्यागने से वह सुखी हो जाता है।
 
Yudhishthira said: By giving up pride a man becomes dear to others, by giving up anger he does not grieve, by giving up lust he becomes wealthy and by giving up greed he becomes happy.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)