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श्लोक 3.313.77  |
यक्ष उवाच
किं नु हित्वा प्रियो भवति किं नु हित्वा न शोचति।
किं नु हित्वार्थवान् भवति किं नु हित्वा सुखी भवेत्॥ ७७॥ |
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| अनुवाद |
| यक्ष ने पूछा, "किस चीज़ को त्यागने से मनुष्य को प्रिय लगता है? किस चीज़ को त्यागने से वह शोक नहीं करता? किस चीज़ को त्यागने से वह धनवान बनता है? और किस चीज़ को त्यागने से वह सुखी होता है?" |
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| The Yaksha asked, "By giving up what does a man find dear? By giving up what does he not grieve? By giving up what does he become wealthy? And by giving up what does he become happy?" |
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