श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  3.313.72 
युधिष्ठिर उवाच
पुत्र आत्मा मनुष्यस्य भार्या दैवकृत: सखा।
उपजीवनं च पर्जन्यो दानमस्य परायणम्॥ ७२॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने कहा - पुत्र मनुष्य की आत्मा है, पत्नी उसकी दिव्य सहचरी है, बादल उसकी आजीविका हैं और दान ही उसका परम आश्रय है।
 
Yudhishthira said - The son is the soul of man, the wife is his divine companion, the clouds are his livelihood and charity is his ultimate refuge.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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