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श्लोक 3.313.7-9  |
देवाश्चापि यदावोचन् सूतके त्वां धनंजय॥ ७॥
सहस्राक्षादनवर: कुन्ति पुत्रस्तवेति वै।
उत्तरे पारियात्रे च जगुर्भूतानि सर्वश:॥ ८॥
विप्रणष्टां श्रियं चैषामाहर्ता पुनरञ्जसा।
नास्य जेता रणे कश्चिदजेता नैष कस्यचित्॥ ९॥ |
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| अनुवाद |
| "धनंजय! तुम्हारे जन्म के समय देवताओं ने भी कहा था कि 'कुन्ती! तुम्हारा यह पुत्र सहस्त्र नेत्रों वाले इन्द्र से किसी प्रकार कम नहीं होगा।' उत्तर पारियात्र पर्वत पर समस्त प्राणियों ने तुम्हारे विषय में यही कहा था कि 'यह अर्जुन शीघ्र ही पाण्डवों का खोया हुआ राज-धन वापस ले आएगा। इसे युद्ध में कोई पराजित नहीं कर सकेगा और यह भी किसी को पराजित किए बिना नहीं रहेगा।'॥ 7-9॥ |
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| “Dhananjaya! When you were born, even the gods had said that ‘Kunti! This son of yours will not be any less than the thousand-eyed Indra.’ On the Uttara Pariyatra mountain, all the creatures had said the same about you that ‘This Arjuna will soon bring back the lost royal wealth of the Pandavas. No one will be able to defeat him in battle and he too will not remain without defeating anyone.'॥ 7-9॥ |
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