श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  3.313.64 
युधिष्ठिर उवाच
सार्थ: प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सत:।
आतुरस्य भिषङ्मित्रं दानं मित्रं मरिष्यत:॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले - सहयात्रियों का समुदाय अथवा उसके साथ यात्रा करने वाला साथी ही यात्री का मित्र है, पत्नी गृहस्थ की मित्र है, वैद्य रोगी का मित्र है और दान मरते हुए व्यक्ति का मित्र है ॥64॥
 
Yudhishthir said - The community of fellow travelers or the companion traveling with him is the friend of the traveler, the wife is the friend of the householder, the physician is the friend of the patient and charity is the friend of the dying person. 64॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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