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यक्ष उवाच
किंस्वित् सुप्तं न निमिषति किंस्विज्जातं न चोपति।
कस्यस्विद्धृदयं नास्ति किंस्विद् वेगेन वर्धते॥ ६१॥
अनुवाद
यक्ष ने पूछा, "कौन सोते समय भी अपनी आँखें बंद नहीं करता? कौन जन्म लेने के बाद भी हिलता-डुलता नहीं है? किसके पास हृदय नहीं है? और कौन तेजी से बढ़ता है?"
The Yaksha asked, "Who does not close his eyes even when he is sleeping? Who does not move even after being born? Who does not have a heart? And who grows rapidly?"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥