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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  3.313.58 
युधिष्ठिर उवाच
देवतातिथिभृत्यानां पितॄणामात्मनश्च य:।
न निर्वपति पञ्चानामुच्छ्वसन्न स जीवति॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने कहा, 'जो व्यक्ति देवताओं, अतिथियों, परिवार के सदस्यों, पितरों और आत्मा का पोषण नहीं करता, वह सांस लेते हुए भी जीवित नहीं रहता।'
 
Yudhishthira said, 'He who does not nourish the gods, guests, family members, forefathers and the soul, is not alive even if he breathes.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)