श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  3.313.54 
युधिष्ठिर उवाच
प्राणो वै यज्ञियं साम मनो वै यज्ञियं यजु:।
ऋगेका वृणुते यज्ञं तां यज्ञो नातिवर्तते॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले - प्राण ही यज्ञीय वस्तु है, मन यज्ञ से संबंधित यजु है, ऋचा ही यज्ञ का वरण करती है और उसका यज्ञ अतिक्रमण नहीं करता ॥54॥
 
Yudhishthir said - Life itself is the sacrificial object, mind is the yaju related to the yagya, only Richa chooses the yagya and its yagya does not encroach on it. 54॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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