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श्लोक 3.313.53  |
यक्ष उवाच
किमेकं यज्ञियं साम किमेकं यज्ञियं यजु:।
का चैषां वृणुते यज्ञं कां यज्ञो नातिवर्तते॥ ५३॥ |
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| अनुवाद |
| यक्ष ने पूछा - कौन-सी वस्तु यज्ञ साम है ? कौन-सी (यज्ञ से संबंधित) यज्ञ यजु है ? कौन-सी वस्तु यज्ञ को चुनती है ? और किसका त्याग नहीं होता ? 53॥ |
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| Yaksha asked – Which one thing is Yagya Sama? Which one (related to Yagya) is Yagya Yaju? Which one thing chooses Yagya? And whose sacrifice does not transcend? 53॥ |
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