श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  3.313.52 
युधिष्ठिर उवाच
इष्वस्त्रमेषां देवत्वं यज्ञ एषां सतामिव।
भयं वै मानुषो भाव: परित्यागोऽसतामिव॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने कहा, "क्षत्रियों में धनुर्विद्या की दिव्यता है, उनका त्याग सज्जनों के समान उनका धर्म है, भय एक मानवीय भावना है तथा संकट में शरण लेने वाले को त्याग देना दुष्टों के समान उनका आचरण है।"
 
Yudhishthira said, "The Kshatriyas have the divinity of archery, their sacrifice is their religion like that of good men, fear is a human emotion and abandoning those who come seeking refuge in distress is their conduct like that of bad men." 52.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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