श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  3.313.48 
युधिष्ठिर उवाच
श्रुतेन श्रोत्रियो भवति तपसा विन्दते महत्।
धृत्या द्वितीयवान् भवति बुद्धिमान् वृद्धसेवया॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले - वेदों का अध्ययन करने से मनुष्य श्रोता बनता है, तप से महान पद प्राप्त करता है, धैर्य से (अन्य साथियों सहित) द्वितीय होता है और बड़ों की सेवा करने से बुद्धिमान होता है ॥48॥
 
Yudhishthir said - By studying the Vedas, a person becomes a listener, by penance he attains great status, by patience he becomes second (with other companions) and by serving elders he becomes wise. 48॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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