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श्लोक 3.313.47  |
यक्ष उवाच
केनस्विच्छ्रोत्रियो भवति केनस्विद् विन्दते महत्।
केनस्विद् द्वितीयवान् भवति राजन् केन च बुद्धिमान्॥ ४७॥ |
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| अनुवाद |
| यक्ष ने पूछा: हे राजन! मनुष्य किस प्रकार श्रोत्रिय बनता है ? किस प्रकार वह महान पद प्राप्त करता है ? किस प्रकार वह द्वितीय बनता है ? और किस प्रकार वह बुद्धिमान बनता है ?॥ 47॥ |
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| The Yaksha asked: O King! By what means does a man become a Shrotri? By what means does he achieve the great position? By what means does he become second? And by what means does he become intelligent?॥ 47॥ |
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