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mahabharat 3.313.43-44: युधिष्ठिर ने कहा- यक्ष! मैं तुम्हारी वस्तु छीनना नहीं चाहता। मुझे अपनी प्रशंसा स्वयं करनी चाहिए; सज्जन पुरुष कभी ऐसी प्रशंसा नहीं करते। मैं अपनी बुद्धि के अनुसार तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर दूँगा, तुम मुझसे प्रश्न पूछो।   |   mahabharat अध्याय 3.313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 43-44
 
 
श्लोक  3.313.43-44 
युधिष्ठिर उवाच
न चाहं कामये यक्ष तव पूर्वपरिग्रहम्।
कामं नैतत् प्रशंसन्ति सन्तो हि पुरुषा: सदा॥ ४३॥
यदात्मना स्वमात्मानं प्रशंसे पुरुषर्षभ।
यथाप्रज्ञं तु ते प्रश्नान् प्रतिवक्ष्यामि पृच्छ माम्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने कहा- यक्ष! मैं तुम्हारी वस्तु छीनना नहीं चाहता। मुझे अपनी प्रशंसा स्वयं करनी चाहिए; सज्जन पुरुष कभी ऐसी प्रशंसा नहीं करते। मैं अपनी बुद्धि के अनुसार तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर दूँगा, तुम मुझसे प्रश्न पूछो।
 
Yudhishthira said- Yaksha! I do not want to take away the thing that belongs to you. I should praise myself; good men never praise this. I will answer your questions according to my wisdom, you ask me questions.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)