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mahabharat 3.313.26: क्योंकि मरने के बाद भी मेरे इन भाइयों के शरीर में कोई विकृति नहीं आई है। अब भी मेरे भाइयों के मुख की चमक मनभावन है।’ इस प्रकार वह विचार में मग्न रहा॥26॥   |   mahabharat अध्याय 3.313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  3.313.26 
मृतानामपि चैतेषां विकृतं नैैव जायते।
मुखवर्णा: प्रसन्ना मे भ्रातॄणामित्यचिन्तयत्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
क्योंकि मरने के बाद भी मेरे इन भाइयों के शरीर में कोई विकृति नहीं आई है। अब भी मेरे भाइयों के मुख की चमक मनभावन है।’ इस प्रकार वह विचार में मग्न रहा॥26॥
 
Because even after death, there is no deformity in the bodies of these brothers of mine. Even now the glow on the faces of my brothers is pleasing.' In this way he remained immersed in thought.॥ 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)