श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 19-21
 
 
श्लोक  3.313.19-21 
अथ संस्तभ्य धर्मात्मा तदाऽऽत्मानं तपोयुत:।
एवं विलप्य बहुधा धर्मपुत्रो युधिष्ठिर:॥ १९॥
बुद्धॺा विचिन्तयामास वीरा: केन निपातिता:॥ २०॥
नैषां शस्त्रप्रहारोऽस्ति पदं नेहास्ति कस्यचित्।
भूतं महदिदं मन्ये भ्रातरो येन मे हता:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात्, धर्मात्मा एवं तपस्वी धर्मपुत्र युधिष्ठिर मन को शान्त करके और बहुत शोक करके बुद्धि से विचार करने लगे - 'इन वीरों को किसने मारा है? इनके शरीर पर शस्त्रों के प्रहार का कोई चिह्न नहीं है और न इस स्थान पर किसी अन्य के चरणों का कोई चिह्न है। मैं समझता हूँ, अवश्य ही किसी बड़े भूत ने मेरे भाइयों को मारा है।॥ 19-21॥
 
Thereafter, the virtuous and ascetic Dharmaputra Yudhishthira, after calming his mind and mourning a lot, started thinking with his intellect- 'Who has killed these brave men? There is no mark of the blow of weapons on their bodies and neither is there any mark of the feet of anyone else at this place. I think, it is definitely some big ghost who has killed my brothers.॥ 19-21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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