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mahabharat 3.313.16: परम बुद्धिमान युधिष्ठिर अपने भाइयों को पृथ्वी पर पड़े हुए पर्वत शिखरों के समान शान्त भाव से सोते हुए देखकर अत्यन्त दुःखी हुए। उनके सारे शरीर से पसीना बहने लगा और वे अत्यन्त पीड़ा में पहुँच गए॥16॥   |   mahabharat अध्याय 3.313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.313.16 
सानूनिवाद्रे: संसुप्तान् दृष्ट्वा भ्रातॄन् महामति:।
सुखं प्रसुप्तान् प्रस्विन्न: खिन्न: कष्टां दशां गत:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
परम बुद्धिमान युधिष्ठिर अपने भाइयों को पृथ्वी पर पड़े हुए पर्वत शिखरों के समान शान्त भाव से सोते हुए देखकर अत्यन्त दुःखी हुए। उनके सारे शरीर से पसीना बहने लगा और वे अत्यन्त पीड़ा में पहुँच गए॥16॥
 
The most intelligent Yudhishthira was very sad to see his brothers sleeping so peacefully like mountain peaks lying on the ground. His whole body started sweating and he reached a very painful state.॥16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)