श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.313.15 
अविक्षतशरीराश्चाप्यप्रमृष्टशरासना:।
असंज्ञा भुवि संगम्य किं शेध्वमपराजिता:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
‘आपके शरीर पर कोई घाव नहीं है, आपको धनुष-बाण का स्पर्श भी नहीं हुआ है और आप किसी से पराजित होने वाले भी नहीं हैं; ऐसी अवस्था में आप इस पृथ्वी पर क्यों अचेत पड़े हैं?’॥15॥
 
‘There are no wounds on your body, you have not even been touched by a bow or arrow and you are not going to be defeated by anyone; in such a condition why are you lying unconscious on this earth?’॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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