|
| |
| |
श्लोक 3.313.133  |
यक्ष उवाच
तस्य तेऽर्थाच्च कामाच्च आनृशंस्यं परं मतम्।
तस्मात् ते भ्रातर: सर्वे जीवन्तु भरतर्षभ॥ १३३॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| यक्ष ने कहा, 'हे भरतश्रेष्ठ! आपने धन और कामना की अपेक्षा दया और समता को अधिक महत्व दिया है, अतः आपके सभी भाई जीवित रहें।' 133 |
| |
| The Yaksha said, 'O best of the Bharatas! You have respected kindness and equality more than wealth and desire, so may all your brothers be alive.' 133 |
| |
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आरणेयपर्वणि यक्षप्रश्ने त्रयोदशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३१३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें यक्षप्रश्नविषयक तीन सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१३॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १३४ श्लोक हैं।) |
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|