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mahabharat 3.313.131: मेरे पिता की कुन्ती और माद्री नाम की दो पत्नियाँ थीं। मैं तो यही सोचता हूँ कि उन दोनों को पुत्र उत्पन्न होते रहना चाहिए॥131॥   |   mahabharat अध्याय 3.313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.313.131 
कुन्ती चैव तु माद्री च द्वे भार्ये तु पितुर्मम।
उभे सपुत्रे स्यातां वै इति मे धीयते मति:॥ १३१॥
 
 
अनुवाद
मेरे पिता की कुन्ती और माद्री नाम की दो पत्नियाँ थीं। मैं तो यही सोचता हूँ कि उन दोनों को पुत्र उत्पन्न होते रहना चाहिए॥131॥
 
My father had two wives named Kunti and Madri. I think both of them should continue to have sons.॥ 131॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)