श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.313.13 
अश्मसारमयं नूनं हृदयं मम दुर्हृद:।
यमौ यदेतौ दृष्ट्वाद्य पतितौ नावदीर्यते॥ १३॥
 
 
अनुवाद
मुझ जैसे दुष्ट का हृदय निश्चय ही पत्थर और लोहे का बना है, जो आज भूमि पर पड़े हुए इन दोनों भाइयों नकुल और सहदेव को देखकर नहीं टूटता॥13॥
 
The heart of this wicked person like me is surely made of stone and iron, which does not break at the sight of these two brothers Nakula and Sahadeva lying on the ground today.॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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